
इस भीड़ में युवाओं की भागीदारी बढ़ चढ़ कर थी,वही युवा जिनको साथ जोड़ने के लिए राजनैतिक दल तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं.हरा नीला भगवा और लाल या जितने भी रंग हों सबके नीचे लाने के उपाय किये जाते हैं,पर अब वो दिन भी कहानियों में ही हैं जब यह वर्ग किसी झंडे के नीचे होकर निकलता था तो उसकी धमक सुनाई पड़ती थी.ऐसे में ये सबक तो मिला ही की इन्हें उदासीन समझने की गलती न की जाय,इनकी उर्जा बची हुई है,बस ये निराश हो चुके हैं उन लोगों से जिन्होंने इन्हें सुनहरे सपने दिखाए फिर कहीं का नहीं छोड़ा.इस उत्सव में भी कहीं से भी सुनहरे सपने नहीं थे,बस आजादी थी उस झंडे को उठाने की जो कुछ समय पहले तक कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की गाड़ियों पर ही सजता था और खास दिनों पर ही आम जनता के हाथ में दिख सकता था.पर जनता भी उसे उठाने में हिचकती थी.
इस उत्सव ने तिरंगा उठाने का गर्व हर उस आदमी को महसूस कराया जो इसमें शामिल हुआ.अब जब की झंडा भी वापस रखा जा चुका है और रामलीला मैदान भी खाली हो चुका है तब फिर वो युवा ,जो भले ही कहा जारहा है की खास वर्ग से ही था,वापस अपनी जिंदगी में लौट चुका है.अब उस सैलाब,हालाँकि ये भी अभिजात्य मीडिया द्वारा गढ़ा गया कहा जारहा है,को अपने साथ लेने के लिए फिर मारामारी होगी.क्योंकि केवल टीवी कैमरों में फोकस पाने के लिए ही ये सड़क नहीं पर उतरे थे, इनको वो झंडा चाहिए जिसके नीचे आने में गर्व महसूस हो और इस काम के के लिए इन्हें घूस न दी जाय.बस उन्हें प्रेरित किया जाय और उन्मादी न बनाया जाय.
सपने दिखाने वाले बहुत आये और आते रहेंगे,सपने अधूरे ही रहेंगे

नमस्कार,
जवाब देंहटाएंहमें आपका लेखन बहुत पसंद आया. हमारी वेब साईड की क्लिकिंग 38 लाख से ज्यादा हो गयी है और हम इसमें विभिन्न लेखकों, कवियों तथा ब्लाग वालों को बेहतर स्थान दे रहें हैं ताकि उनके पाठक बढ़ें. कृपया आपकी हमें अपनी कृतियाँ जरूर भेजें post@helloraipur.com इस कृति को देखें www.helloraipur.com के बेहतरीन लेखन एवम बेहतरीन ब्लॉग में.
सादर निमंत्रण है आप हमारे साईड अवश्य देखें और आपत्ति होने पर हमें सूचित करें post@helloraipur.com
बिलकुल सही और सटीक लिखा है आपने ...
जवाब देंहटाएंसुगढ़ लेखन...
जवाब देंहटाएंसादर बधाई...
I liked the content & spirit .
जवाब देंहटाएं