तिरंगे की बहार



चलिए भारतीय जनतंत्र का एक उत्सव समाप्त हुआ,और मैं भी अन्ना तू भी अन्ना कहने वाले अपने अपने ठिकानों पर वापस लौट गए .बधाई हो नवीन जिंदल को,एक युवा के रूप में उन्होंने अमेरिका में हर जगह फहरते वहां के झंडे को देख कर अपने देश में भी ऐसी आज़ादी की लडाई लड़ी.उन्हें सफलता मिली और हमें भी अधिकार मिला की तिरंगा लेकर सडकों पर जब चाहें तब उतर सकें. आज़ादी के बाद पहली बार तिरंगे की ऐसी बहार आई की दर्जियों को ओवर टाईम करना पड़ा.निश्चित ही इस भीड़ के हाथों में तिरंगा जाने से आन्दोलन या उत्सव ,जो भी था ,उससे लोगों का जुडाव बढ़ता गया.ऐसी स्थिति में राष्ट्रिय चेतना मर गयी है जैसी बातें कहने वाले बुजुर्गों को कुछ राहत मिली होगी.निश्चित ही जो तिरंगे सडकों पर आये होंगे आज सम्मान के उन घरों में में रखे होंगे जहाँ से वो निकले थे.और वो फिर निकलेंगे जब कोई राष्ट्रिय पर्व आएगा.
इस भीड़ में युवाओं की भागीदारी बढ़ चढ़ कर थी,वही युवा जिनको साथ जोड़ने के लिए राजनैतिक दल तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं.हरा नीला भगवा और लाल या जितने भी रंग हों सबके नीचे लाने के उपाय किये जाते हैं,पर अब वो दिन भी कहानियों में ही हैं जब यह वर्ग किसी झंडे के नीचे होकर निकलता था तो उसकी धमक सुनाई पड़ती थी.ऐसे में ये सबक तो मिला ही की इन्हें उदासीन समझने की गलती की जाय,इनकी उर्जा बची हुई है,बस ये निराश हो चुके हैं उन लोगों से जिन्होंने इन्हें सुनहरे सपने दिखाए फिर कहीं का नहीं छोड़ा.इस उत्सव में भी कहीं से भी सुनहरे सपने नहीं थे,बस आजादी थी उस झंडे को उठाने की जो कुछ समय पहले तक कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की गाड़ियों पर ही सजता था और खास दिनों पर ही आम जनता के हाथ में दिख सकता था.पर जनता भी उसे उठाने में हिचकती थी.
इस उत्सव ने तिरंगा उठाने का गर्व हर उस आदमी को महसूस कराया जो इसमें शामिल हुआ.अब जब की झंडा भी वापस रखा जा चुका है और रामलीला मैदान भी खाली हो चुका है तब फिर वो युवा ,जो भले ही कहा जारहा है की खास वर्ग से ही था,वापस अपनी जिंदगी में लौट चुका है.अब उस सैलाब,हालाँकि ये भी अभिजात्य मीडिया द्वारा गढ़ा गया कहा जारहा है,को अपने साथ लेने के लिए फिर मारामारी होगी.क्योंकि केवल टीवी कैमरों में फोकस पाने के लिए ही ये सड़क नहीं पर उतरे थे, इनको वो झंडा चाहिए जिसके नीचे आने में गर्व महसूस हो और इस काम के के लिए इन्हें घूस दी जाय.बस उन्हें प्रेरित किया जाय और उन्मादी बनाया जाय.
सपने दिखाने वाले बहुत आये और आते रहेंगे,सपने अधूरे ही रहेंगेपर तिरंगे के साथ निकली ये भीड़ बहुत कुछ कहती है.बस इनका मनोविज्ञान समझा जाय जिसके लिए किसी कंपनी के सी बन कर नहीं वरन इनके धरातल पर आकर और इनकी भाषा में संवाद करना होगा,जो भाषा ये दिल से समझते हों.और उस भाषा में लगायी गयी पुकार पर साथ चलने के लिए तैयार हों जाएँ.ऐसा ही अन्ना ने किया और सफल रहे अब अपना अपना मोर्चा खोले बाकी लोगों की बारी है.

5 टिप्‍पणियां:

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