गंगे तुम बहती कैसे हो !

गंगा क्या है, एक नदी, देश के एक बड़े भूभाग की जीवनधारा और हिन्दुओं के लिए मोक्षदायिनी, पतित- पावनी पुण्यसलिला.कोई शक नहीं की गंगा का हमारे जीवन मरण में बहुत बड़ा महत्त्व है, पर हम गंगा की शुचिता के लिए क्या करते हैं.अभी गंगा पर बात आस्ट्रेलिया से उठी,वहां एक रेडियो प्रस्तोता ,काईल ने गंगा को एक लाइव कार्यक्रम में जंकयार्ड कहा. बवाल मच गया ,आस्ट्रेलियन हिन्दू संगठन के यदु सिंह ने रेडियो कंपनी और सरकार से इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया और तमाम हिन्दुओं की भावनाओं को देखते हुए वहां के अखबारों में भी इस कार्यक्रम की निंदा की गयी.यहाँ देश खुद अनेक मोर्चों पर जूझ रहा है फिर भी कुछ संस्थाओं ने एक गुमनाम से आस्ट्रेलियन को हीरो बनाया,जाहिर है इससे रेडियो के श्रोता बढे ही होंगे और श्रोता बढ़ेंगे तो प्रस्तोता की आय भी बढ़ेगी ही.
गंगा किस शहर में नहाने लायक बची हैं? अगर आस्था का हिलोर न हो तो स्वाभाविक रूप से मेरे ख्याल से किसी भी जगह गंगा ऐसी स्थिति में नहीं हैं जहाँ ख़ुशी से डुबकी लगाने का जी करे.हाँ ,गंगोत्री की बात छोड़ दीजिये, बस गोमुख से गंगोत्री तक बारह- तेरह किलोमीटर तक की यात्रा में ही गंगा शुद्ध हैं.ध्यान रहे मैं वैज्ञानिक रूप से शुद्धता की बात कर रहा हूँ.गंगोत्री ही वो पड़ाव है जहाँ गंगा का सामना आम जन से होना शुरू हो जाता है और हम उसे मैली करने का दायित्व भी वहीँ से पूरे शद्ध भाव से शुरू करदेते हैं.उत्तरकाशी भरा पूरा शहर है,जहाँ से सुनियोजित जल-मल का निस्तारण गंगा में होने लगता है और गंगासागर तक ये कार्यक्रम बना रहता है.टिहरी में हिमालय के एक कोने में सदा के लिए अँधेरा करते हुए बड़ा सा बांध बना दिया गया और बांध दी गयीं गंगा,ताकि हिंदुस्तान रोशन हो सके.यहाँ एक बहुत बड़ी झील बनगई है जिसमें गंगा का अवरोधित जल अत्यंत ही दारुण रूप में दिखता है,शायद बांध की भेंट चढ़े टिहरी शहर की हाय लग गयी है.बांध के नियंत्रित दरवाजों से होती हुई गंगा हरिद्वार पहुंचती हैं जहाँ उनकी धारा को कृतिम रूप से मोड़ कर हर की पैड़ी बना दी गयी है ताकि धरम का धंधा चलता रहे.और फिर आगे गंगा का क्या हाल है सब जानते हैं.समय समय पर शोध होते रहते हैं और कहा जाता है की अब जल आचमन के योग्य भी नहीं रहा.ऐसे ही तमाम शहरों का कचरा ढोते हुए गंगासागर में ये दुखद यात्रा समाप्त होती है.गंगासागर के बारे में कभी एक बंगाली मित्र ने बताया था की मकर संक्रांति के समय बहुत से लोग घर के बुजुर्गों को जबरदस्ती 'जय बोलुन दादा' के नारे के साथ पानी में डुबाते रहते हैं ताकि गंगा मोक्ष प्रदान करदें.
गंगा सफाई के नाम पर न जाने कितनी योजनायें और महायोजनायें बनीं,बड़ी बड़ी बातों के साथ एक्सन प्लान भी बने, पर आवंटित धन ऐसे समुंदर में लुप्त होता जाता है की थाह लगाना मुश्किल है.रामकृष्ण परमहंस जी एक बार,अपने भक्तो के बहुत जोर देने पर काशी आये,मंदिरों में घूम फिर के गंगा घाट पर बैठे.साथ आये लोगों ने पूछा की यहाँ सबसे बढ़िया क्या लगा तो उनका जवाब था की यहाँ के लोगों की पाचन शक्ति बहुत अच्छी है.जाहिर है घाटों पर प्रमाण बिखरे पड़े थे.आज तो स्थिति ऐसी हो गयी है की गंगा को ही पचा लेने वाली व्यवस्था पैदा होगई है.ऐसे में दूर आस्ट्रेलिया में कोई कुछ कहता है तो चिल्लाने की बजाय हम ये सोचें की हम गंगा के लिए क्या कर रहे हैं.

3 टिप्‍पणियां:

  1. "गंगा नदी नहीं है - आस्था है
    गंगा जल नहीं है - अमृत है "

    इन दो लाइनों में समाहित भारतीय
    जनमानस की अभिव्यक्ति को और
    अधिक शब्दों की आवश्यकता नहीं है .
    परन्तु इसमें बहती हमारी नियमित
    गंदगी क्या इसे जीवित रख सकेगी .
    आम जन के मन और आत्मा
    को पावन करने के लिए गंगा का अवतरण
    प्रथ्वी पर हुआ था . पर इसमें मिली गंदगी
    क्या बहूत समय तक ऐसा कर पाएगी ?
    आइये मिल बैठ कर सोचें - और हल की
    दिशा में बिना किसी सरकारी और स्वयं
    सेवी संगठनो की सहायता के हम सभी
    ऐसा कुछ करें जिससे गंगा को अपने पूर्व
    स्वरुप में आने में मदद मिले. कम से कम
    ऐसी सोच तो हर भारतीय के मन में उत्पन्न
    की ही जा सकती है .

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  2. सही कहता है पर सही सुनने की क्षमता भारतीयों मे रही नही शायद। और कोई ऐसा देश नही होगा जहां के निवासी अपने मल को केमिकल कचरे को गंदंगी को अपनी अराध्य नदी मे बहा फ़िर उसकी आरती करें पूजा करें और शुद्ध हो जायें।

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