हिंदी इज कूल !


हिंदी दिवस,सुनने में बड़ा अजीब लगता है.अब इसमें अजीब क्या है?खड़ी बोली के इतिहास में जाने की जरूरत नहीं,जैसे इंडिया दैट इस भारत है वैसे ही दुनिया को पता है की हिंदुस्तान की एक भाषा हिंदी है.कुछ वर्षों पहले तक ये गंभीर चिंता का विषय था की हिंदी गंवार गवंई भारत की बोली बन के न रह जाए, क्योंकि शाईनिंग इण्डिया हो रहा था.गाँव  की गलियों में भी कार्मेंट स्कूल खुल रहे हैं..'स्पोकिंग' अंग्रेजी ठीक करने के लिए  'व्हेन आई टाक तो आईये टाक' मार्का स्पोकेन क्लासेस की दुकानों की बाढ़ आगई.हिंदी पिछड़े पन की निशानी समझी जा रही थी,तभी भूमंडली करण की बयार चली और भला होने लगा हिंदी का भी.बाज़ार मुट्ठी में करने के लिए निकले शूरमाओं को सबसे पहले ध्यान आया की हिंदी तो देश की आत्मा है,फिर तो क्रिएटिव हिंदी का स्कोप बढ़ा और तरह तरह के विज्ञापन किसी न किसी रूप में हिंदी को प्रमोट करने लगे.सिनेमा का तो बहुत बड़ा योगदान है,विदेशों का नहीं मालूम पर अपने यहाँ तो अहिन्दी भाषी फौजियों को उनकी यूनिट में सिनेमा दिखाया जाता है ताकि भाषा समझने लगें.ये अलग बात है की हिंदी के संवाद रोमन स्क्रिप्ट में लिख कर हीरो हिरोईन को दिए जाते हैं,क्योंकि ज्यादेतर कलाकार ओरिजनल अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पढ़े हैं जहाँ हिंदी बोलने पर सजा दी जाती है.पर इस तरीके  से कटरीना जैसों को लाभ मिलता है और फायदे में हम भी हैं ,वर्ना एक प्रतिभा से हम वंचित रहते.
हिंदी में एक शिकायत ये भी है की लोग हिंदी साहित्य पढ़ते ही नहीं,पढ़ते भी हैं कभी कभार तो खरीद के तो बिलकुल नहीं.इसी कारण साहित्य का विकास नहीं हो पा रहा है,जैसे लगता ही की प्रेमचंद पहले अपने पाठक सेट कर लेते थे तब लिखना शुरू करते थे.पर इस लिखंत पढंत को नया आयाम मिल गया साईबर अंतरजाल से.बाज़ार का सोच के ही सही पर अमेरिकी कंपनियों के ऊपर आधारित इंटरनेट ने हिंदी को जो दिशा दी उससे भारतेंदु और रामचंद शुक्ल की आत्माएं भी प्रसन्न होंगी. फेसबुक द्वारा रचनात्मकता के योगदान पर तो शोध होने चाहिए.हर आदमी जिसके पास नेट है,थोडा बहुत क्रिएटिव हो ही गया है.कभी ये रचनात्मकता मौलिक दिखती है तो कभी  क़तर ब्योंत और कापी पेस्ट की कारीगरी भी रहती है.लेकिन बात हिंदी की तो रहती ही है.फिर इसमें ब्लोगिंग ने तो क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया.मसि कागद का झंझट ही ख़तम.बस जो जी में आये लिखिए , हाँ पाठक धीरे धीरे आही जाते हैं नहीं तो गुट बना के आप किसी को लाईक करिए,कमेन्ट मारते रहिये ,शर्म लिहाज होगी तो वो भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेगा. और सबसे बड़ी बात ऐसी हिंदी सेवा में खर्चा भी कुछ अधिक नहीं है और पहुँच की थाह तो नारद मुनि को भी लगाना मुश्किल.तो चिंता की कोई बात नहीं,हिंदी बची रहेगी.मना लेने दीजिये दिवस,कम से कम इसी बहाने तमाम संस्थानों में कुछ लोगों को नौकरी मिली हुई है.याद आता है हिंदी प्रेमी मुलायम यादव के मुख्यमंत्री रहते जारी एक सर्कुलर जिसको ब्यूरोक्रेसी ने अपनी भाषा में जारी किया था की-"आल कंसर्न्ड आफिसर्स आर रिक्वेस्टेड टू यूज हिंदी,इन प्लेस ऑफ़ इंग्लिश." 
 पर साहब बहादुर लोग भी समझें की हिंदी हमारे दिलों में है,सपने हमें हिंदी में ही आते हैं.पूरे देश को जोड़ती है और दुनिया में हमारी पहचान है हिंदी.   


2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा है आपने जन भाषा जो मिटाना संभव नही दुर्दशा का मूल कारण अखबारों के द्वारा अच्छे लेखों और लेखकों को आपला मानुस के जाल मे फ़ंसा दया का पात्र बना दिया था अब फ़ेसबुक जैसे माध्यम लेखको और पाठकों के बीच सीधा माध्यम बन गये हैं और अच्छे लेखो को पसंद करने वाले लोग लेखकों का मनोबल बढ़ा रहे हैं सो आगे के लिये संकेत शुभ नजर आते हैं।

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  2. वाह ....बहुत सही लिखा है आपने

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